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Disadvantages of mobile: जरा ठहरिए! अपने लाडले के हाथ में मोबाइल देने से पहले जान लें ये बात

Disadvantages of mobile
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Disadvantages of mobile: 21वीं सदी को निसंदेह ही तकनीक की सदी कहा जा सकता है. बच्चों से लेकर बड़े-बुड्ढों तक का जीवन तकनीक पर इस कदर निर्भर हो चुका है कि इसके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती. पहले जियो की डाटा क्रांति और फिर कोरोना काल ने हर आम खास को घर की चारदीवारी के अंदर इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स (Electronic gadgets) के साथ अधिक से अधिक समय बिताने का रास्ता खोल दिया. इन्हीं में से एक है समार्टफोन, जिसके बिना हम एक पल भी नही रह सकते. इसी मोबाइल ने एक तरफ जहां हमारे जीवन में सुगमता का अनुभव करवाया है तो दूसरी तरफ इससे होने वाले दुष्प्रभावों की फेहरिस्त कहीं अधिक लंबी है.

मोबाइल के दुष्प्रभाव इस कदर हमारे जीवन को प्रभावित कर सकते हैं जिसे जानने के बाद आपका मुंह खुला रह जाएगा. मोबाइल का सबसे अधिक नुकसान जिसे भुगतना पड़ेगा, वो है हमारी आने वाली पीढ़ी. और जिसके ज़िम्मेवार हम खुद होंगे. हम इस समार्टफोन नाम की बीमारी से, इसके गंभीर परिणामों (Disadvantages of mobile) को जानते हुए भी अपने बच्चों को इससे दूर रखने का जरा भी प्रयास नहीं कर रहे. जाने अंजाने अगर आप भी अपने लाडले को उसकी जरा सी जिद के चलते, तुरंत उसके हाथ में मोबाइल थमा देते हैं, तो सावधान हो जाइए! मोबाइल नामक बीमारी के निगेटिव परिणाम अपना प्रभाव दिखाने के लिए आपकी लापरवाही का ही इंतजार कर रहे हैं.

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बेशक इंटरनेट को ज्ञान का खजाना माना जा सकता है लेकिन आज हम मोबाइल से होने वाले दुष्प्रभावों की बात करने वाले हैं जिसे हमने कई चरणों में बांटा है. इसके अलावा मोबाइल का प्रभाव किस आयु वर्ग के बच्चे को कितना प्रभावित (Disadvantages of mobile) करता है इसे भी हमने कई आयु वर्ग में बांटा है.

मोबाइल के दुष्प्रभाव (Disadvantages of mobile in Hindi)

ट्राई के ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 100 करोड़ मोबाइल उपभोक्ता है. जिनमें से करीब 70% यूजर्स औसत रूप से दिन में करीब 6 घंटे मोबाइल का प्रयोग करते हैं और 98% यूजर्स 20 से 22 घंटे मोबाइल के संपर्क में ही रहते हैं. एक शोध के मुताबिक वायरलेस उपकरण इलेक्ट्रोमेग्नेटिक रेडिएशन छोडते हैं जिससे स्वास्थ्य पर घातक रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

मोबाइल के आर्थिक नुकसान (Economic losses of mobile)

मोबाइल के आर्थिक नुकसान तो सर्व विदित है ही. महंगा मोबाइल और महंगा रिचार्ज, वो भी रेगुलर. समय के साथ साथ मोबाइल के लेटेस्ट मॉडल खरीदना भी एक खर्चीला चस्का है. मोबाइल का स्टेट्स सिंबल समझना और 10 से बीस हज़ार की सामान्य सी सैलरी वालों 50 हज़ार तक का समार्टफोन खरीदने को मजबूर कर देता है. और जिसका परिणाम आर्थिक तंगी के रूप में घर परिवार के सभी सदस्यों को भुगतना पड़ता है.

मोबाइल के सामाजिक नुकसान (Mobile social harm)

मोबाइल के अधिक समय तक इस्तेमाल करने वाला अपने आसपास के परिवेश से बिलकुल अंजान और बेपरवाह हो जाता है. उसके आसपास क्या हो रहा है, इसे जानने की बजाए वह दूर दराज के लोग क्या कर रहे हैं इस पर अधिक ध्यान देने लग जाता है.

अपने घर परिवार को समय देने की अपेक्षा मोबाइल पर अधिक समय देने वाले बच्चे खेल कूद पर ध्यान देने की जगह मोबाइल गेम्स (Mobile Games) में रुचि रखने लगते है जिससे वो अवसाद के साथ साथ हिंसक भी होने लगते हैं. ऐसे बच्चे/बड़े मोबाइल की दुनिया को ही यथार्थ की दुनिया समझने लगते हैं. पेरेंट्स की अवहेलना करना, अपने आसपास के लोगों और रिशतेदारों से कन्नी काटने लगते हैं. ऐसे बच्चों के दोस्तों का दायरा भी सीमित हो जाता है जो भविष्य के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बनता है.

मोबाइल के शारीरिक नुकसान (Physical damage to mobile)

अधिक समय तक मोबाइल यूज करने वालों का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है और गुस्सा अधिक आने लगता है. मोबाइल के आदी बच्चे खेल कूद जैसी सारीरिक गतिविधियों में भाग नहीं ले पाते जिससे उनका सर्वांगीण विकास नहीं हो पाता है. अधिक समय तक एक ही अवस्था में बैठा रहना, भूख-प्यास को रोक्न और पेशाब के दबाव को रोकना भी एक बहुत बड़ी समस्या बन जाता है जिसका परिणाम गंभीर हो सकता है. मोबाइल का अधिक प्रयोग आपको अनिद्रा, सिरदर्द, बैचेनी और थकान के अलावा कमजोरी और आँखों के लिए भी बहुत नुकसानदायक है.

मोबाइल के साइक्लोजिकल नुकसान (Mobile ke psychological nuksan)

कोरोना काल के बाद से सभी स्कूलों/कॉलेजों की पढ़ाई भी ऑनलाइन होना शुरू हो गई. बड़ी क्लासेज की बात तो छोड़ो प्राथमिक स्कूलों ने भी ऑनलाइन क्लासेज पर ज़ोर दिया. सरकार ने भी ऑनलाइन पढ़ाई के महत्व को समझते हुए सभी बच्चों की पढ़ाई सुचारु चलती रहे, इसके लिए पेरेंट्स और स्कूलों को पाबंद किया. लेकिन समार्टफोन के दुष्प्रभावों (Disadvantages of mobile) और इसका बच्चों पर कम से कम असर पड़े, इस बाबत न ही तो कोई रिसर्च की गई और ना ही कोई गाइडलाइंस जारी हुई.

मोबाइल का बच्चों का प्रभाव (Mobile impact of children)

वायरलेस उपकरण जितना इलेक्ट्रोमेग्नेटिक रेडिएशन (Electromagnetic radiation) छोडते हैं उससे सबसे अधिक प्रभावित छोटे बच्चे होते हैं, मोबाइल रेडिएश्न से उनके स्वास्थ्य पर बड़ों की तुलना में अधिक घातक रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. मोबाइल फोन की स्क्रीन पर कई प्रकार के कीटाणु चिपके हो सकते हैं जो हमें दिखाई तो नहीं देते पर त्वचा से जुड़ी कई बिमारियों के लिए जिम्मेदार (Disadvantages of mobile) होते हैं. करोना काल में तो मोबाइल को सेनेटाइज किए बिना यूज करना निसंदेह भारी गलती होगी. बिलकुल छोटे बच्चे अपनी आँखों के नजदीक से मोबाइल देखते हैं जिससे आँखों में दर्द, जलन और सूखापन के साथ ही कम उम्र में चश्मा लग्ने जैसी दिक्कत आम बात है.

5 साल से कम आयु वर्ग के बच्चों पर मोबाइल का प्रभाव (Mobile impact on children under 5 years of age)

5 साल या इससे कम आयु के बच्चों को मोबाइल से दूर रखना ही श्रेयकर रहेगा. शुरू-शुरू में भले ही अपनी सुविधा के लिए बच्चों का मन बहलाने हेतु अथवा अपने किसी कार्य में व्यवधान से बचने के लिए पेरेंट्स छोटे छोटे हाथों में मोबाइल थमा देते है, जिससे वो अपना कामकाज तो बिना रुकावट के कर सकते हैं लेकिन इसका खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है.

Mobile ke nuksan

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मोबाइल की चमकदार डिशप्ले और ध्वनी भी उसे आकर्षित करती है. जिससे मोबाइल के प्रति बच्चे की उत्सुकता बढ़ जाती है. बच्चों की आंखें मोबाइल की चमक के प्रति बहुत संवेदनसील होती है. आँखों के नजदीक मोबाइल का उपयोग करना भी बच्चों के लिए बहुत खतरनाक साबित होता है.

मोबाइल में ब्लास्ट होने के भी कई केसेज सामने आए हैं लिहाजा, बच्चों के हाथ में मोबाइल देने से पहले जरा सचेत हो जायें. इसके अलावा मोबाइल के अधिक समय तक चलाते रहने से मोबाइल गरम होना भी बच्चों की नाजुक त्वचा को क्षतिग्रस्त करने के लिए प्रयाप्त है.

सावधानी- छोटे बच्चों को मोबाइल देने से पहले कांट्रास्ट कम कर दें. मोबाइल अगर चार्जिंग पर लगा हुआ हो तो बच्चों को भूलकर भी ना दें.

5 साल से 11 साल तक के बच्चों पर मोबाइल का प्रभाव (Impact of mobile on children from 5 years to 11 years)

इस आयु वर्ग के बच्चों में कार्टून देखने को लेकर काफी उत्सुकता होती है. हालांकि, इन्हें सुनने और समझने में अभी उतना इंटरेस्ट नहीं होता जितना देखने में होता है. इन्हें मोबाइल में विडियो देखने भर से मतलब होता है जिनमें कार्टून या इससे मिलते जुलते कंटेन्ट शामिल है. वार्ता या संवाद को समझने की इनमें इतनी समझ नहीं होती. आँखों पर प्रभाव, मोबाइल की हीट और चार्जिंग अथवा बलास्ट के खतरे से ये भी अछूते (Disadvantages of mobile) नहीं है. इन सबके अलावा जरूरी कॉल मिस कर देना, गेम खेलने की लालसा और मोबाइल के फीचर ब्राउज़ करने की जिज्ञासा इनमें अधिक होती है.

11 साल से 17 साल तक के बच्चों पर मोबाइल का प्रभाव (Impact of mobile on children from 11 years to 17 years)

11 से 17 साल तक के बच्चों को उनकी पढ़ाई के लिए मोबाइल देना जरूरी हो जाता है. इस आयु वर्ग के बच्चे मोबाइल को चलाना औसत रूप से सीख जाते हैं इससे मोबाइल की गेलरी में लॉक लगाना या फिर आपतिजनक सामग्री को हटा देना पहला काम है. दूसरा, उनके मोबाइल यूज करते हुए फ्रॉड कॉल (Fraud Call) भी आ सकती है, लिहाजा उन्हें इस बाबत बताना और किसी भी अनजान कॉलर को अपनी, अपने घर की स्थिति, एड्रैस और ओटीपी जैसी संवेदनसील जानकारी ना देने के प्रति बच्चों को जागरूक करना अत्यावशक है.

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आपके बच्चे मोबाइल पर क्या ब्राउज़ कर रहे हैं, इस बारे में समय समय पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. आजकल इंटरनेट पर अश्लील सामग्री की भरमार है और आपकी लापरवाही बच्चों को अश्लील कंटेन्ट से रूबरू करवा सकती है.

18 साल से अधिक आयु वर्ग के बच्चों पर मोबाइल का प्रभाव (18+ age ke bachchon par Mobille ke parbhav)

Disadvantages of mobile- इस उम्र में बच्चे व्यस्क हो चुके होते हैं लिहाजा मोबाइल पर सोशल मीडिया के उपयोग को लेकर आपको बेहद सतर्क रहना होगा. अधिकतर प्रेम प्रसंग के मामलों की जड़ सोशल मीडिया ही होती है. ऐसे मामलों का अंजाम क्या होता है ये शायद आपको बताने की जरूरत नहीं है. फ्रॉड कॉल से लेकर हिंसक और अश्लील कंटेन्ट बच्चों को अक्सर बहका देते हैं, जिसका खामियाजा बच्चों और उनके पेरेंट्स के साथ ही पूरे समाज को भुगतना पड़ता है.

बच्चों के मोबाइल उपयोग संबंधी हिदायतें (Instructions on children’s mobile usage)

शुरू-शुरू में भले ही अभिभावक अपनी सुविधा के लिए बच्चों का मन बहलाने हेतु उनके हाथों में मोबाइल थमा देते है. जिससे वो अपना कामकाज तो बिना रुकावट के कर सकते हैं, लेकिन इसका खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है. बच्चे जो कुछ भी मोबाइल में देखते सुनते है उसका सीधा असर उनके शारीरिक एंवम मानसिक विकास के साथ साथ सामाजिक रिश्तों पर भी पड़ता है. जिस माहौल में बच्चे रहेंगे या जैसा वे देखेंगे और सुनेंगे वैसा ही असर उनके सोचने समझने की क्षमता (Ability to think) पर पड़ेगा. इससे उनमें वैसे ही गुण आ जाते है. स्मार्टफोन पर ज्यादा से ज्यादा समय बिताने वाले बच्चों के स्वभाव में चिड़चिड़ापन और आक्रमकता आम बात है जो भविष्य में बच्चे की उन्नति में बाधक बनती है.

अभिभावक जब भी बच्चों को मोबाइल नहीं देंगे तो बच्चे को गुस्सा आना लाज़मी है और गुस्से में वह घर की चीजों को तोड़ देता है, खिलौने/चीजों को फेंक देता है या फिर अपशब्द बोलने लगता है. मोबाइल की लत बच्चे का खाना पीना, साफ-सफाई को प्रभावित करती है जिससे बच्चे की मानसिक एंवम शारीरिक सेहत खराब होने का डर लगातार बना रहता है. यही वजह कभी कभार पेरेंट्स को अपने बच्चे की अच्छी सेहत के लिए थोड़ा सख्त रवैया अपनाने को मजबूर करती है. वरना बेहद कम ऊम्र में बच्चे चिड़चिड़े और गुस्सेल हो जाते हैं.

बच्चे को मोबाइल देने से पहले सावधानी (Caution before giving mobile to child)

बच्चे में अधिक समझ नहीं होती है उसके लिए सब सही हो सकता है किंतु एडवांस तकनीकी से बना मोबाइल आजकल इंटरनेट (Internet) के माध्यम से खरीद्दारी, आर्थिक लेनदेन जैसे महत्वपूर्ण कार्य घर बैठे संपन्न करने में सक्षम है बच्चा यदि ऐसा करने का प्रयत्न नासमझी में करे तो परिवार को आर्थिक नुक्सान (Disadvantages of mobile) उठाना पड़ सकता है. इसलिए बच्चों के सामने आर्थिक लेनदेन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को न करें. बच्चे को मोबाइल देने से पूर्व कुछ महत्वपूर्ण अप्प जो बच्चे के काम की नहीं है उन पर लॉक लगाना न भूलें.

आपको बता दें कि दुनियाभर में अभिभावकों द्वारा बच्चों के हाथ में स्मार्ट फ़ोन देने के अलग-अलग मकसद हो सकते हैं, इसलिए बच्चे की आयु के आधार पर उसकी ईमेल आईडी बनाई जाए और चाइल्ड प्रोटेक्शन सुविधा ऑन रखें तो अभिभावक बच्चे की गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं, ताकि बच्चा गलत पोस्ट न देख पाए. किंतु बच्चा यदि जरूरत से ज्यादा समय मोबाइल पर चैट करने लगा है या फिर किसी अन्य साईट पर विजिट करने में लगा है तो थोड़ी सख्ती जरूरी है अन्यथा बच्चे की शिक्षा से बढ़ती दूरी नतीजों में परिवर्तन लाने के लिए काफी है. इसीलिए बाल मनौविज्ञान बच्चे को हाईटेक उपकरण चलाने की अनुमति सीमित समय तक देने के पक्ष में हैं.

बच्चों को मोबाइल से दूर रखने के मुख्य कारण (Main reasons to keep children away from mobile)

छोटा बच्चा बिना किसी पाबंदी के मोबाइल चलाता हुए घंटों तक एक ही स्थिति में बैठा रहता है जिससे उसकी कोमल आँखें मोबाइल स्क्रीन (Mobile Screen) तक टिकी रहने के कारण सेहत पर निश्चित रूप से घातक असर हो सकता है. आपको बता दें कि मोबाइल की नीली रोशनी आँखों के लिए बहुत ही हानिकारक होती है.

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मोबाइल से बच्चों के पारिवारिक एंवम सामाजिक रिश्तों में दूरी (Disadvantages of mobile) बढ़ने लगती है. बच्चा अगर गेम्स खेलने लगे तो वह घर से बाहर की वास्तविकता और वास्तविक खेलों से जुड़े अनेकों महत्वपूर्ण क्रियाकलापों से दूर रह जाता है. कुछ गेम्स इस तरह डिज़ाइन किए गए होते हैं जिससे बच्चों की मानसिकता हिंसक हो सकती है. जबकि कुछ गेम्स बच्चों को मानसिक अवसाद की तरफ लेकर जाते हैं. पिछले कुछ समय से कई बार बच्चों को गेम्स खेलने के बाद सुसाइड करने जैसी भी घटनाएँ प्रकाश में आई है.

अश्लील कंटेन्ट (Pornographic content)

आजकल मोबाइल में अश्लील कंटेन्ट होना एक आम बात हो गई है. जरा सी लापरवाही बच्चों को अश्लील सामग्री देखने का चस्का लगा देती है. इसलिए बच्चों को मोबाइल देने से पहले अपने मोबाइल से इंटरनेट कनैक्शन बंद कर दें या फिर आप खुद वयस्क सामग्री देखने की आदत छोड़ दें. इसके अलावा जब भी बच्चों के हाथ में मोबाइल देना हो तो पहले मोबाइल का कांट्रास्ट कम कर दें अथवा रीडिंग मोड/आइ प्रोटेक्शन मोड पर कर दें.

इन सबके अलावा एक विशेष बात, अगर माता-पिता का मोबाइल बच्चा यूज करता है तो सोशल मीडिया प्लेटफार्म (Bright student) पर बच्चा व्यस्क सामग्री (Pornographic content) से रूबरू हो सकता है. क्योंकि गूगल जैसे अप्प, जहां आपसे साइन इन करने से पहले आपकी उम्र, लिंग आदि का विवरण आपसे मांगते हैं. और उसी सेटिंग को बिना बदले अगर आप बच्चों के हाथ में मोबाइल थमा देते हैं तो गूगल या इसी तरह के दूसरे प्लेटफॉर्म की नज़र में मोबाइल ब्राउज़ करने वाला बच्चा नहीं बल्कि आप है क्योंकि अकाउंट आपने अपने नाम से बनाया हुआ है.

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अगर इन सब के बावजूद आपको अपना मोबाइल बच्चे को देना मजबूरी है तो आप मोबाइल की सेटिंग में यूजर नाम से एक ऑप्शन होता है, वहाँ जाकर बच्चे की उम्र की डीटेल डालकर दूसरा यूजर ऍड कर सकते हैं और जब भी बच्चे को मोबाइल देना हो तो यूजर चेंज करके दें.

अगर भविष्य का एक ब्राइट स्टूडेंट (Bright student) आपकी हद दर्जे की लापरवाही की वजह से अपने फ्यूचर को अंधकार में धकेल देता है तो इसके ज़िम्मेवार निसंदेह आप ही होंगे. तो अगली बार अपने लाडले के हाथ में मोबाइल देने से पहले सोच लेना की कहीं आप खुद अपने बच्चों के पैरों पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार रहे?